रविवार, 5 सितंबर 2010

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मंगलवार, 25 नवंबर 2008

प्रण बहुत किए हमने....

प्रण बहुत किए हमने !

प्राण बहुत किए हमने
अंजाम देना बाकी है।
हाथ बहुत जोड़ चुके हैं
हाथों से काम लेना बाकी है।

और कब तक बहाओगे आंसू
ऐ वतन के नौजवान?
ज़िन्दगी भर सहे सितम तो क्या
जुल्मो-सितम की तमाम सेना बाकी है।

घुट घुट के जिए हो
तिल तिल के मरे जा रहे हो;
गर्व से कहते हो फिर भी,
आख़िरी मुकाम अभी बाकी है।

बहुत हो चुका रोना धोना
बाँध लो अब सर पे कफ़न।
बुजदिली का दामन छोडो
भीषण संग्राम अभी बाकी है.

मीडिया ओछी हरकतों से कब बाज़ आएगा?

मिडिया ओछी हरकतों से कब बाज आएगा?

आजकल माले गाँव धमाको के नाम पर महाराष्ट्र ऐ टी एस रोज़ कुछ न कुछ धमाका करने में लगा है। अंपने देश का समूचा मिडिया तंत्र बढ़चढ़ कर इसमे हिस्सा ले रहा है। ले भी क्यों न, काफ़ी दिनों के बाद कुछ नया मिला है।महीनो आरुशी का मुर्दा कुरेदने के बाद कुछ दिन परमाणु करार के नाम पे तो कुछ दिन अहमदाबाद और दिल्ली के धमाको के कारण उसे कुछ मसाला मिलता रहा।वरना न्यूज़ में कॉमेडी और फूहड़ मनोरंजन तक देखने को मिलते रहते। वैसे भी अगर पिछले साल भर मिडिया जगत की कुल उपलब्धि राजू श्रीवास्तव, राखी सावंत और राज ठाकरे से ज्यादा दिखाई नही देती। माले गाँव ने उसे अबकी कुछ नया परोसने का मौका दिया है। अभी ताल आतंक मुस्लिम था, अब जाकर वो हिंदू आतंक कहा जा सकता है; भला ऐसा स्वर्णिम अवसर अपना जागरूक मीडिया तंत्र कैसे खो सकता है। भला हो प्रभास जोशी और पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसे कुछ एक कलम वीरो का जिन्होंने अभी तक पत्रकारिता को जिंदा रखने का जिम्मा अपने कंधे पे उठा रखा है। हमारे तमाम टीवी चैनलों के खबरी लोगो ने तो माले गाँव मामले में भी पूर्व के तमाम मामलों की तरह किसी मुक्कमल जानकारी के ही अपना फैसला सुना दिया है।
अभी ऐ टी एस जांच कर ही रही है, लेकिन कुछ ने प्रज्ञा ठाकुर और दयानंद को भगवा आतंक का पर्याय घोषित भी कर दिया है तो कुछ ने सेना के अधिकारी पुरोहित को माले गाँव से लेकर समझौता एक्सप्रेस में हुए हादसे का मस्तेर्मैंड तक करार दिया है। एक पुरानी कहावत है की जब झुंड में सब कौवे हो तो हंसो को जात बहार कर दिया जाता है। मीडिया में भी जात बाहर होने का खतरा कई लोगो को हमेशा रहता है, तभी तो धीरे धीरे सब एक ही सुर में सुर मिलाने लगते हैं।
कलम का दिवालियापन और क्या होगा की अमर उजाला के नामचीन और वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर तक ने बिना किसी ठोस आधार के किसी संवेदनशील मुद्दे पे अपनी कलम चलने से पहले एक बार भी नही सोचा। १७ नवंबर का अमरउजाला गलती से हाथ में आ गया; गलती से इसलिए की एक बार जनसत्ता पढ़ लेने के बाद कुछ और पढने की जरुरत नही रहती, खैर ! अमरउजाला में छापा शशि शेखर जी का लेख सम्पादकीय पेज पर छापा मिला। पढ़कर दुःख हुआकी किस दम पर शेखर जी जैसे व्यक्ति ऐसी घटिया अभिव्यक्ति दे सकते हैं। मैं ये नही कहता की हिंदू हिंसक नही हो सकता या हिंसा की अभिव्यक्ति हिंदू समाज में नही होती। लेकिन हिंसक होना और आतंकवादी होना दो अलग अलग बातें हैं.वो भी किसी ठोस परिणाम के बगैर सारे हिंदू समाज को कटघरे में खड़ा करने वालों को मुद्दा थमा देना कहाँ तक न्यायोचित है ये किसी भी कलम वीर को कलम उठाने से पहले सोचना होगा।

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

क्या सबक ले हम....

सबक लिया करते थे जिनसे
वो तो सभी लफंगे हो गए हैं।
शर्माए क्या उनसे हम
जो ख़ुद से ही नंगे हो गए हैं।
लहलहाती थी फसले जहाँ पर
धरती अब वो वीरान है।
मेले लगते थे जहाँ पे
वहां अब दंगे हो गए हैं।
खादी सस्ती हो गई है
भगवा पहनना आसान है।
पापी थे जितने भी सारे
गंगा नहाकर चंगे हो गए हैं.

राम के देश में

हे राम!
हम शर्मिंदा हैं,
देश में, रावण अब भी जिन्दा हैं ।
तेरी कथा सुनने की फुर्सत नही है,
रावण का गुणगान वितरण हो रहा है;

हे राम!
तेरे देश मेंदेवों का स्टिंग ओपरेशनऔरदैत्यों का चरित्र चित्रण हो रहा है।
हे राम !
सतियों का तप भंगकरा के सुर्प्नाखाओंका फैशन शो हो रहा है,
शबरी जूठे बेर को तरसे
जटायु कटे पंख को रो रहा है।
सत्ता कुम्भकर्ण की नींद सो रही है
जनता माँ कौशल्या की भाँती रो रही है।
धर्म के ठेकेदार कैकई सा हठ लिए बैठे हैं;
पुजारी मन्दिर के चढावे पर ऐंठे हैं।

है राम!
ये क्या हो रहा है?
राम के देश में सीता का देहव्यापार हो रहा है।
हे राम !
हम शर्मिंदा हैं।
माँ सीता का अपमान करने वालेकलाकारअब भी जिन्दा हैं।
तेरी धर्म ध्वजा को धुल धूसरित करने वालेसिपहसालार अभी जिंदा हैं।

हे राम!
अबकी तुम अवतार न लेना।
बस भेज दो अपनी वानर सेना।
अब कोई शान्ति का संदेश नही;
किसी दैत्य को हमने देना।
है राम!
अबकी रहम की भीख न दोकिसी विधर्मी आततायी को;
एक काम हो सके तो करना,
भेज दो लछमन भाई को।
हे शेषनाग के अवतार लछमन!
हम शर्मिंदा है।
राम के देश में ,
रावण के वंशज ;
ये हमारे राजनेताअब भी जिन्दा है.