मिडिया ओछी हरकतों से कब बाज आएगा?
आजकल माले गाँव धमाको के नाम पर महाराष्ट्र ऐ टी एस रोज़ कुछ न कुछ धमाका करने में लगा है। अंपने देश का समूचा मिडिया तंत्र बढ़चढ़ कर इसमे हिस्सा ले रहा है। ले भी क्यों न, काफ़ी दिनों के बाद कुछ नया मिला है।महीनो आरुशी का मुर्दा कुरेदने के बाद कुछ दिन परमाणु करार के नाम पे तो कुछ दिन अहमदाबाद और दिल्ली के धमाको के कारण उसे कुछ मसाला मिलता रहा।वरना न्यूज़ में कॉमेडी और फूहड़ मनोरंजन तक देखने को मिलते रहते। वैसे भी अगर पिछले साल भर मिडिया जगत की कुल उपलब्धि राजू श्रीवास्तव, राखी सावंत और राज ठाकरे से ज्यादा दिखाई नही देती। माले गाँव ने उसे अबकी कुछ नया परोसने का मौका दिया है। अभी ताल आतंक मुस्लिम था, अब जाकर वो हिंदू आतंक कहा जा सकता है; भला ऐसा स्वर्णिम अवसर अपना जागरूक मीडिया तंत्र कैसे खो सकता है। भला हो प्रभास जोशी और पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसे कुछ एक कलम वीरो का जिन्होंने अभी तक पत्रकारिता को जिंदा रखने का जिम्मा अपने कंधे पे उठा रखा है। हमारे तमाम टीवी चैनलों के खबरी लोगो ने तो माले गाँव मामले में भी पूर्व के तमाम मामलों की तरह किसी मुक्कमल जानकारी के ही अपना फैसला सुना दिया है।
अभी ऐ टी एस जांच कर ही रही है, लेकिन कुछ ने प्रज्ञा ठाकुर और दयानंद को भगवा आतंक का पर्याय घोषित भी कर दिया है तो कुछ ने सेना के अधिकारी पुरोहित को माले गाँव से लेकर समझौता एक्सप्रेस में हुए हादसे का मस्तेर्मैंड तक करार दिया है। एक पुरानी कहावत है की जब झुंड में सब कौवे हो तो हंसो को जात बहार कर दिया जाता है। मीडिया में भी जात बाहर होने का खतरा कई लोगो को हमेशा रहता है, तभी तो धीरे धीरे सब एक ही सुर में सुर मिलाने लगते हैं।
कलम का दिवालियापन और क्या होगा की अमर उजाला के नामचीन और वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर तक ने बिना किसी ठोस आधार के किसी संवेदनशील मुद्दे पे अपनी कलम चलने से पहले एक बार भी नही सोचा। १७ नवंबर का अमरउजाला गलती से हाथ में आ गया; गलती से इसलिए की एक बार जनसत्ता पढ़ लेने के बाद कुछ और पढने की जरुरत नही रहती, खैर ! अमरउजाला में छापा शशि शेखर जी का लेख सम्पादकीय पेज पर छापा मिला। पढ़कर दुःख हुआकी किस दम पर शेखर जी जैसे व्यक्ति ऐसी घटिया अभिव्यक्ति दे सकते हैं। मैं ये नही कहता की हिंदू हिंसक नही हो सकता या हिंसा की अभिव्यक्ति हिंदू समाज में नही होती। लेकिन हिंसक होना और आतंकवादी होना दो अलग अलग बातें हैं.वो भी किसी ठोस परिणाम के बगैर सारे हिंदू समाज को कटघरे में खड़ा करने वालों को मुद्दा थमा देना कहाँ तक न्यायोचित है ये किसी भी कलम वीर को कलम उठाने से पहले सोचना होगा।
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